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Rahul Nigam


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इल्म आदमी होने का- Contest

Posted On: 9 Jan, 2014  
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Contest कविता में

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फलसफा महब्बत का – Contest

Posted On: 9 Jan, 2014  
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Contest कविता में

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एक अंडर ऐज माँ का दर्द………

Posted On: 12 May, 2013  
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Posted On: 5 May, 2013  
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‘फलसफा महब्बत का’

Posted On: 9 Sep, 2012  
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“गुरु-शिष्य” इस रिश्ते को कोई और नाम न दो…

Posted On: 5 Sep, 2012  
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इल्म – आदमी होने का!

Posted On: 3 Sep, 2012  
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मेरे अंधेरों का उजाला-’मेरी माँ’

Posted On: 26 Aug, 2012  
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14 Comments

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

अमानत जी, आपने मेरे इस ब्लॉग पर नजरें इनायत की, शुक्रिया और फिर 'शायर' कह दिया तो ये तो ज्यादा हो गया. मैं केवल दिल की बातें बिना किसी नियम या विधा के अधीन हो कर लिखता हूँ तो 'शिल्प विहीन' रचनाकार की श्रेणी में आता हूँ. कुछ भावना पसंद लोग मेरी भावनाओं की कदर कर हौसला बढ़ा देते तो थोडा उत्साहित हो जाता हूँ. बस ये ही मेरा इनाम है. आपके ब्लॉग 'मेरा इश्क......' पर मेरी प्रतिक्रिया पर आपकी प्रतिक्रिया ने थोडा निराश किया. बकौल अज़ीम देहलवी 'गिरते है शह-सवार ही मैदानेजंग में, वो तिफ्ल क्या गिरे जो घुटनों के बल चला करते हैं.' आपके लिए बस इतना कहना चाहूँगा: किसी को शीशे में उतारना जरूरी तो नहीं है 'दोस्त' करने के लिए मिले 'धोखे' तो 'कल' थे, 'भरोसा' तो 'आज' खुले हाथों से बांटने दो.

के द्वारा: Rahul Nigam Rahul Nigam

के द्वारा: reena reena

हाथ जोड़कर नमस्कार राहुलजी, मैं पहली पाठक हूँ आपकी , बहुत खूब लिखा आपने..अच्छे व् सभ्य लोग तो छोडिये हमारे फिल्म अभिनेता तक राजनीती में पैर न डालने की सलाह देते हैं..अरे अगर कोई अच्छा पहले प्रवेश नहीं करेगा तो हम बुरे को कैसे सुधर पायेंगे? और तो और यही पढ़े लिखे मुझे समझ नहीं आते..हर अच्छी बुरी चीज़ का एहसास किताबों हमें बताती हैं उसके बावजूद भी हम उन पर न जाने क्यूँ अमल नही करते. दरअसल ये पढ़े लिखे खुद बहुत बड़े स्वाभिमानी हैं..ये यही सोचते हैं की हम खुद को या अपने बच्चों की जान जोखिम में क्यूँ डालें...और अपने बच्चे को राज्नितिग्ये नहीं डॉक्टर या अध्यापक ही बनायेंगे और जीवन भर सुख चैन की रोटी खायेंगे ...पहले मैं ही क्यूँ का सवाल दिल से जाता ही नहीं..लेकिन हाँ अवैध धन कहीं से भी मिले उसे तो पहले मैं पहले मैं लेने के लिए हर कोई मार काट मचा देगा..मर गया है ऐसे लोगों का आत्म सम्मान..धन्येवाद अमानत

के द्वारा: amanatein amanatein

फिरदौस जी शुक्रिया मेरे ब्लॉग पर नजरे इनायत का. वैसे मैं पेशे से लेखक नहीं हूँ हाँ कभी कभी दिल को कुछ चुभता है, कचोटता है, कुछ भाता है, कुछ दिल को छू जाता है या कभी बहुत भावुक हो जाता हूँ तो कुछ लिखने का मन कर जाता है तो लिख जाता हूँ कब और कैसे मालूम नहीं. कोशिश करता हूँ कि किसी के व्यक्तिगत जीवन में दखलंदाज़ी न करूँ. जो लोग अपनी मां की उम्र की महिलाओं को भी नहीं छोड़ते…या वो महिलाएं जो अपने बेटे की उम्र के लड़कों के साथ नाजायज़ रिश्ते बनाने अपनी शान समझती हैं…यद्यपि ये कृत्य असामाजिक और अनैतिक है पर यदि ये स्वेच्छा से है तो ये सिर्फ मसालेदार कहानी या अश्लील साहित्य का हिस्सा बन सकते है, इसमें सुधार जैसी गुंजाईश की उम्मीद मुझे तो बेमानी लगती है क्योकि लुके छुपे तो ये बरसो से इस समाज में व्याप्त है. हाँ जब इस तरह के संबंधो में 'बलात' अथवा 'षड़यंत्र' का भाव आ जाता है तो इस सामाजिक ढांचे के दोगलेपन पर आक्रोश स्वत ही उत्पन्न हो जाता है और कोई न कोई जिसमे कभी कभी मैं भी शामिल हो जाता हूँ और कुछ लिख जाता हूँ. और शायद मैंने इंडिया टीवी का वो स्टिंग ऑपरेशन देखा नहीं था तो ऐसा कुछ याद भी नहीं इसीलिए इस बारे में कुछ कह नहीं सकता.

के द्वारा: Rahul Nigam Rahul Nigam

यद्यपि हमारे आपके बीच कोई ये विवाद का विषय नही हैं पर पता नहीं क्यूं मुझे लगता है की खुद अकेले निर्णय लेने में और दूसरो के साथ मिल कर निर्णय लेने में बहुत फर्क होता है और फिर दूसरो के लिए निर्णयों की आलोचना तो बहुत ही सरल होती है क्योकि आलोचक के पास कुछ खोने को नहीं होता. यदि कोई किसी के निर्णय लेने की परिस्थतियों को समझेगा तो समझ सकेगा कि प्रायः नैतिकता के लिए आत्महत्या करना कितना मुश्किल होता है. इतिहास में ऐसे बिरले ना के बराबर मिलेगे. यहाँ तक कि देवताओ ने भी अपने सर्वाइवल के ऐसी आत्महत्याओं से परहेज़ किया है. रहा सवाल तर्क का तो तर्क से गणित के सवाल तो हल हो सकते है पर जिंदगी तर्क से नहीं केवल अपने जीने से और अपने जीने तक ही चलती है इसके बाद हमारी जिंदगी की अच्छाइयां बुराइयाँ जिंदा बचे लोगो की सोच और विचारधारा पर निर्भर हो जाती है. आज भी गौतम, गाँधी जैसे लोगो को अच्छा बुरा कहने वाले लोगो के बीच खून खराबा तक हो जाता है.

के द्वारा: Rahul Nigam Rahul Nigam

के द्वारा: Rahul Nigam Rahul Nigam

के द्वारा: UMASHANKAR RAHI UMASHANKAR RAHI

आज समाज के दोहरे मापदंड नारी को एक तरफ पूज्यनीय बताते है तो दूसरी ओर उसका शोषण कर उसके देह की नुमाइश करतें नज़र आते है हद तो तब हो जाती है जब पेन, कापी, पेंसिल और बस्ते के विज्ञापन औरत की नग्न देह के माध्यम से किये जाते है प्रिय राहुल जी ..बधाई हो इस बेबाक लेख के लिए ..मुसीबत है कि इस समाज में अर्थ को बहुत अधिक मान्यता दी जा रही है -किसी भी तरह से कमा लो -समाज में आप को लोग साथ बिठाएं -आप का गुण गायें -पढ़ी लिखी लड़कियां रोजगार की तलाश में कहाँ कहाँ भटक जाती हैं -हमारी राजधानी की ख़बरें हों या अन्य की ..कान में जहर घोल देती हैं - आकर्षण के लिए इनका इस्तेमाल जायज नहीं --वैसे हमारे नारी समाज को भी इसमें कुछ नकारना चाहिए --वही स्वीकार करें जो उचित हो तब तो हमारा आप का ढोल पीटना किसी को सुनाई भी पड़े धन्यवाद shuklaabhramar5

के द्वारा:

राहुल जी, बिलकुल विचारणीय प्रश्न उठाये हैं आपने जिससे मैं भी सहमत हूँ परन्तु क्या नारी का कुछ दोष नहीं है इसके पीछे| ताली दोनों हाथों से बजती है| फिर भी इस पुरुष-प्रधान समाज में नारी का स्थान सशक्त हुआ है और आज देश-दुनिया के तमाम बड़े पदों और ओहदों पर स्त्रियां विराजमान हैं और जब सत्ता उनके हाथ है तो उन्हें भी तो प्रयास करने चाहिए नारी के उत्थान के लिए| हाँ पुरुषों के लिए भी ज़रूरी है कि वे नारी के प्रति अपने पूर्वाग्रही दृष्टिकोण में परिवर्तन करें उनको आगे लाने में सहयोग करें| समय मिले तो इस इस लेख पर भी दृष्टिपात करियेगा| http://kashiwasi.jagranjunction.com/2011/03/05/%e0%a4%ae%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%be-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b5%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%a5%e0%a4%95%e0%a4%a4%e0%a4%be/

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

राहुल जी अभिवादन .. नारी मुक्ति और विकास के सही मायने तो आपने बताये है.. सच ये है की ये सब लोकतान्त्रिक देशो में एक तरह का ढोंग होता है आम जनता को शांत रखने के लिए.. जरा सोचिये अगर किसी दिवस से कोई परिवर्तन हो जाता तो गाँधी जयंती जो अब विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जाता है उसके प्रभाव से तो पुरे विश्व में अहिंसा शांति व्याप्त हो जाती... महिला दिवस कुछ राजनतिक रोटी सकने का हथकंडा है जिसमे नेता , राजनितिक दल और खाना पूर्ति के लिए महिलामुक्ति का झंडा थामे कुछ महिलाये भासन देने आ जाती है, जेसिका लाल या मट्टू जी केस जब होते है तो जबतक मिडिया की चाशनी उन्हें मसालेदार नहीं बना देती तबतक न तो नारी मुक्ति वाले आते है न ही कोई दल...और न ही जनता... एक दिन का जश्न ही है जो नारी उत्थान के नाम पर मनाया जाता है और अगले दिन फिर किसी नारी के साथ शोषण , हत्या या बलात्कार जैसी घटनाये होती है.. और नारी मुक्ति के नाम पर कुछ अति आधुनिक नारिया अपने कपडे उतारकर बाजार में उत्पादों के कवर की शोभा बन जाती है ....और औरो को भी उसी ग्लैमर की तरफ खीचती है... एक बढ़िया लेख

के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY




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